साइनानेहवालकीउपस्थितिनेइसआयोजनकोएकअलगसांस्कृतिकअर्थभीदिया।खेलकेमैदानमेंभारतकोविश्वस्तरपरपहचानदिलानेवालीखिलाड़ीकेहाथोंऐसीसाहित्यिककृतिकालोकार्पणहुआ, जिसकाकेंद्रसमाजकेउनप्रश्नोंपरहै, जोमनुष्यकेजीवनकीबुनियादीजरूरतोंऔरउसकेअधिकारोंसेजुड़ेहैं।यहउपलब्धिऔरसंवेदनाकाऐसासंगमरहा, जिसमेंखेलऔरसाहित्यअपनी-अपनीसीमाओंसेनिकलकरएकसाझामानवीयसरोकारपरदिखाईदिए।
“मैंभूखहूँ” कीविशिष्टताउसकेशीर्षकमेंजितनीदिखाईदेतीहै, उससेकहींअधिकउसकीवैचारिकसंरचनामेंहै। 71 काव्य-रचनाओंवालीइसयुग–काव्य–संहितामें ‘भूख’ कोकेवलविषयकेरूपमेंनहीं, बल्किमहा-नायिकाकेरूपमेंदेखागयाहै।
यहभूखरोटीकीहै, लेकिनकेवलरोटीकीनहीं।यहगरीबीकीभूखहै, बेरोजगारीकीभूखहै, शिक्षाकीभूखहै, न्यायकीभूखहै, सम्मानकीभूखहै, अवसरकीभूखहैऔरसमानताकीभूखहै।यहींसेकृतिकीयात्राव्यक्तिसेसमाजऔरसमाजसेराष्ट्रतकजातीहै। “रोटीसेराष्ट्रतककीवेदना” इसीलिएकेवलउपशीर्षकनहीं, बल्किपूरेग्रंथकीवैचारिकदिशाकोसमझनेकासूत्रबनजातीहै।
डॉ. राहीकेलिएगीतकेवलभावनाओंकोव्यक्तकरनेकामाध्यमनहींहै।वहअपनेसमयकीपीड़ा, विसंगतियोंऔरप्रश्नोंकोस्वरदेनेकामाध्यमभीहै।इसीदृष्टिकोवहएकपंक्तिमेंव्यक्तकरतेहैं—
“जहाँभूखहै—वहाँमैंहूँ,
औरजहाँमैंहूँ—वहाँसुलगतेप्रश्नहैं।”
इसकथनमें “मैंभूखहूँ” कीरचनात्मकचेतनादिखाईदेतीहै।यहाँभूखआँकड़ानहींहै; वहअनुभवहै।वहकेवलआवश्यकतानहीं; वहआकांक्षाहै।औरअंततःवहऐसाप्रश्नहै, जोसमाजसेउत्तरचाहताहै।
कृतिकीदूसरीमहत्वपूर्णविशेषताइसकात्रि-आयामीस्वरूपहै। 71 काव्य-रचनाओंकेसाथ QR कोडआधारितप्रस्तुतिकेमाध्यमसेपाठकरचनाओंकोपढ़नेकेसाथउन्हेंसुनऔरदेखभीसकता है।इसतरहसाहित्यकाअनुभवकेवलमुद्रितपृष्ठतकसीमितनहींरहता।शब्दस्वरमेंबदलताहैऔरस्वरदृश्यतकपहुँचताहै।इसीअभिनवत्रि-आयामीसाहित्यिकप्रस्तुतिकेलिए “मैंभूखहूँ” कोगोल्डनबुकऑफवर्ल्डरिकॉर्ड्समेंदर्जकरविश्वकीर्तिमानबनायागयाहै।
हालाँकिइस कृतिकीसार्थकताकेवलतकनीकीप्रयोगमेंनहींहै।तकनीकयहाँमाध्यमहै; उसकेपीछेसाहित्यकामूलप्रश्नखड़ाहै—मनुष्यऔरउसकीअधूरीजरूरतोंकाप्रश्न।यहीकारणहैकि “मैंभूखहूँ” कोकेवलएकरिकॉर्डकेरूपमेंदेखनाइसकेसाहित्यिकमहत्वकोसीमितकरनाहोगा।
डॉ. अवनीशराहीकीचारदशकोंसेअधिककीसाहित्यिकयात्रासेनिकलीयहकृतिउनकेगीत-सृजन, सामाजिकसरोकारऔरआधुनिकप्रस्तुतिकेबीचविकसितहुईरचनात्मकदृष्टिकोसामनेरखतीहै।अलीगढ़कीसाहित्यिकऔरशैक्षिकभूमिइसयात्राकामहत्वपूर्णआधाररहीहै।इसीसृजनभूमिसेनिकलीकृतिअबराष्ट्रीयसाहित्यिकमंचतकपहुँचीहै।इसलिएइसकादिल्लीतकपहुँचनाकेवलएकपुस्तककास्थानबदलनानहीं, बल्किएकशहरकीसाहित्यिकपरंपराकाव्यापकराष्ट्रीयसंवादसेजुड़नाभीहै।
डॉ. राहीनेप्राप्तसम्मानअपनेप्रथमगुरुएवंपितामहाकविअमरसिंहराहीकोसमर्पितकिया।उन्होंनेकहा, “मेरेलिएयहबहुतभावुकक्षणहै।मुझेसाहित्यकापहलासबकअपनेपितासेहीमिलाहै।मैंअपनेपितामेंहीअपनेजीवनकासम्पूर्णमहाग्रंथदेखताहूँ। ‘मैंभूखहूँ’ केलिएमिलेइससम्मानमेंउनसभीसाहित्यकारों, साहित्यप्रेमियोंऔरपाठकोंकाभीयोगदानहै, जिनसेमुझेकिसीनकिसीरूपमेंकुछनकुछसीखनेकोमिलाहै।यहसम्मानमेरेलिएखुशीकेसाथएकबड़ीजिम्मेदारीभीहैऔरइससेमेरीजिम्मेदारीऔरबढ़गईहै।”
समारोहमेंडॉ. सुरभिसचिनधनवाला, रज़ाउररहमान, मो. बदरउजजमानऔरआनंदप्रकाशसहितसाहित्य, कला, शिक्षा, खेलऔरसंस्कृतिजगतकीअनेकप्रतिष्ठितहस्तियाँउपस्थितरहीं।
22 अगस्तकायहआयोजनइसदृष्टिसेभीउल्लेखनीयरहाकिएकहीमंचपरसाहित्यिकलोकार्पण, रचनाकारकासम्मान, विश्वकीर्तिमानऔरसाहित्यकीआधुनिकप्रस्तुति—चारोंआयामएकसाथउपस्थितहुए।लेकिनइनसभीउपलब्धियोंकेबीच “मैंभूखहूँ” कासबसेबड़ाप्रश्नफिरभीवहीहै—क्यासाहित्यभूखकीआवाजबनसकताहै?
इसकृतिकाउत्तरउसकेकथ्यऔरसंरचनामेंदिखाईदेताहै।वहभूखकोकेवलपेटतकसीमितनहींरखती, बल्किउसेशिक्षा, न्याय, सम्मान, अवसरऔरसमानतासेजोड़तीहैऔरफिरउसीप्रश्नकोराष्ट्रकेव्यापकसंदर्भमेंरखतीहै।
यहीइसकीमूलयात्राहै—रोटीसेराष्ट्रतक।
औरशायदकिसीभीसाहित्यिककृतिकीसबसेबड़ीशक्तियहीहोतीहैकिवहपाठककोकेवलउत्तरदेकरनहीं, बल्किऐसाप्रश्नदेकरविदाकरेजोउसकेभीतरदेरतकजीवितरहे।
“मैंभूखहूँ” काप्रश्नभीऐसाहीहै।
भूखजहाँहै, साहित्यकाप्रश्नवहींसेशुरूहोताहै।
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