डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण

71 काव्य-रचनाओं की त्रि-आयामी युग–काव्य–संहिता को विश्व कीर्तिमान की मान्यता; राही को मिला वैश्विक साहित्य नवाचार सम्माननई दिल्ली,25 अगस्त :...

JR Choudhary
JR Choudhary Verified Public Figure • 30 Mar, 2026 Editorial Desk
Aug 25, 2026 • 4:54 PM | New Delhi  0  0
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डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण
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डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण
डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण

71 काव्य-रचनाओं की त्रि-आयामी युगकाव्यसंहिता को विश्व कीर्तिमान की मान्यता; राही को मिला वैश्विक साहित्य नवाचार सम्मान

नई दिल्ली,25 अगस्त : भूख को यदि केवल पेट की आवश्यकता मान लिया जाए तो उसका अर्थ सीमित हो जाता है। लेकिन जब वही भूख रोटी से आगे बढ़कर शिक्षा, न्याय, सम्मान, अवसर और समानता का प्रश्न बन जाए, तब वह केवल सामाजिक समस्या नहीं रहतीवह साहित्य का विषय भी बन जाती है। डॉ. अवनीश राही की “मैं भूख हूँ : एक युगकाव्यसंहिता” (रोटी से राष्ट्र तक की वेदना) इसी व्यापक दृष्टि के साथ सामने आई है। नई दिल्ली में 22 अगस्त को आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक शब्दोत्सव में इस कृति का भव्य लोकार्पण पद्म भूषण एवं विश्वप्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने किया। इसी अवसर पर डॉ. राही कोवैश्विक साहित्य नवाचार सम्मानसे सम्मानित किया गया।

काइट्सक्राफ्ट प्रोडक्शंस एलएलपी के तत्वावधान में आयोजित समारोह में साइना नेहवाल ने डॉ. राही को अंगवस्त्र, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।मैं भूख हूँसे जुड़े विश्व कीर्तिमान पर बधाई देते हुए उन्होंने कृति को साहित्य की पारंपरिक प्रस्तुति से आगे ले जाने वाला अभिनव प्रयोग बताया। उनके अनुसार यह साहित्य को पठनीय, श्रवणीय और दर्शनीय रूप में अनुभव करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

साइना नेहवाल की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक अलग सांस्कृतिक अर्थ भी दिया। खेल के मैदान में भारत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाली खिलाड़ी के हाथों ऐसी साहित्यिक कृति का लोकार्पण हुआ, जिसका केंद्र समाज के उन प्रश्नों पर है, जो मनुष्य के जीवन की बुनियादी जरूरतों और उसके अधिकारों से जुड़े हैं। यह उपलब्धि और संवेदना का ऐसा संगम रहा, जिसमें खेल और साहित्य अपनी-अपनी सीमाओं से निकलकर एक साझा मानवीय सरोकार पर दिखाई दिए।

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