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मल्लीनाथ पशु मेले में एम.पी.यू.ए.टी ने लगाई उतकृष्ट प्रदर्शनी़


 

उदयपुर: बाढमेर के तलवाडा में विश्वविख्यात मल्लीनाथ पशु मेले के उपलक्ष्य में प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा सात जिलों के आठ कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा दिनांक 1 से 3 अप्रेल, 2022 तक एक कृषि एवं पशु तकनीकी प्रदर्शनी की स्टाल लगाई गई। इस प्रदर्शनी में किसानों, किसान महिलाओं एवं गामीण नवयुवकों को आधुनिक कृषि तकनीकीयों एवं नवाचारों पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा नवीनतम जानकारियां प्रदान की गई। प्रसार शिक्षा निदेशालय के सानिघ्य में इस उन्नत पशु प्रबन्धन पर आयोजित प्रदर्शनी में पश्चिमी राजस्थान के विशेषकर बाढमेर एवं आस पास के जिलों के करीब 5000 से भी अधिक प्रगतिशील किसान भाईयों ने भाग लिया। 
 
प्रदर्शनी के दौरान विश्वविद्यालय ने उन्नत पशु प्रबन्धन, पशु आहार प्रबन्धन, पशु प्रजनन, रख रखाव, पशुओं की उन्नत नस्लों आदि पर विभिन्न प्रकार के पोस्टर, चार्ट, प्रदर्शनी सामग्री आदि का बहुत ही उतकृष्ट प्रदर्शन किया गया जिसे ओर सभी किसानों ने सराहा। विश्वविद्यालय की ओर से इस पशु प्रदर्शनी में कुछ जीवांत प्रदर्शन इकाईया भी लगाई गई थी जिनमें मुर्गी की उन्नत नस्ल “प्रतापधन“ की ईकाई पर किसानों की विशेष भीड रहीं। इसके अतिरिक्त बटेर पालन, वर्मी कल्चर, मुर्गी पालन, उन्नत चूजा पालन आदि पर भी बहुत ही प्रभावशाली एवं जीवांत इकाईयां लगाई गई जिन्हे हजारो किसानो ने देखा और मुर्गीपालन व्यवसाय को अपनाने के लिए तकनीकी जानकारिया प्राप्त की। 
        
विश्वविद्यालय की और से अनेके उन्नत तकनीकों के मॉडल भी प्रदर्शनी में लगाए गए जिनमें रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग, वर्मी कम्पोस्टिंग, उदयराज उन्नत चूल्हा, कूल एनर्जी चैम्बर, नेपीयर घास के प्रदर्शन, प्रसंस्कृत फल एवं सब्जी उत्पाद आदि प्रमुख रहें। साथ ही उपयुक्त पशुधन उद्यम का चयन, सुअर पालन, कुक्कुट पालन, खरगोशा पालन, बटेर पालन आदि सहायक व्यवसायों पर भी प्रदर्शनी में जानकारियां प्रदान की गई 
        
मल्लीनाथ पशु मेले के इस अवसर पर उन्नत पशु प्रबन्धन जैसे विषयों पर व्याख्यान एवं परिचर्चा कार्यक्रम भी ओयोजित किए गए। कार्यक्रम का मुख्य उद्वेश्य किसानों को उन्नत पशु प्रबन्धन के महत्व एवं इसे अपनाने के लिए प्रेरित करना था। 
        
भारत में प्रति पशु दुग्ध उत्पादन का बड़ा अन्तर होने का मुख्य कारण विदेशों में नस्ल सुधार कार्यक्रम है। विदेशी गायों का औसतन दूध उत्पादन 4000 (जर्सी) से 6000 (हॉलिस्टन) लीटर प्रति ब्यांत आंका गया है। भारत में संकर गाय 6.44 किलो, देशी गाय 1.93 किलो एवं भैंस 4.3 किलो दूध औसतन प्रतिदिन देती है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से किसानों को उन्नत नस्ल के पशुओं को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। इसके लिए उन्नत पशु नस्लों के बडे बडे पोस्टर प्रदर्शित किए गए। 
 
 प्रदर्शनी के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्रों के तकनीकी विशेषज्ञों एव वैज्ञानिकों ने उन्नत पशु प्रबन्धन के महत्व पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। उन्होनें प्रदर्शन के विभिन्न माध्यमों से बताया कि राजस्थान पशुधन सम्पदा के मामले में अन्य राज्यों से बहुत आगे है। यहां पर गिर, राठी, थारपारकर व कांकरेज गायें, नागौरी बैल, मालानी घोड़े, बीकानेरी एवं जैसलमेरी ऊंट, जखराना, सिरोही एवं मारवाड़ी नस्ल की बकरियां तथा चोकला, मारवाड़ी, सोनाडी एवं बीकानेरी नस्ल की भेड़ें प्रमुख रूप से पाली जाती हैं। उन्होने बताया कि राजस्थान में पशुपालन व्यवसाय का एक विशेष एवं अलग महत्व है क्योंकि इस प्रदेश का ज्यादातर इलाका सूखा है। 
 
प्रदेश के पश्चिमी रेगिस्तानी मरूक्षेत्र में भूमिहीन किसानों, खेतीहर मजदूरों, पिछड़े वर्ग के लोगों एवं खासतौर से लघु एवं सीमान्त कृषकों के लिए जीविकोपार्जन का एक महत्वपूर्ण आधार पशुपालन है। राजस्थान पशुधन सम्पदा में देश के अनेकों राज्यों से कहीं आगे है। प्रदेश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में पशुपालन का योगदान लगभग 8 प्रतिशत है।
मेले में आयोजित प्रदर्शनी में डॉ आर. ए. कौशिक, निदेशक प्रसार शिक्षा, डॉ. राजीव बैराठी, नॉडल आफिसर, कृषि प्रदर्शनी एवं विभिन्न कृषि विज्ञान केन्दों के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी. एम. यादव, डॉ आर. एल. सोनी, डॉ पी. सी. रेगर, डॉ. बी. एस. भाटी, डॉ, योगेश कनोजिया, डॉ. बी. एल. रोत, डॉ. राजेश जलवानिया आदि वैज्ञानिकों ने भाग लिया।
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